कांगो में इबोला वायरस के नए वैरिएंट ने मचाई तबाही, दो महीने में 1,000 से ज्यादा लोगों की मौत
अफ्रीकी देश कांगो एक बार फिर इबोला वायरस के भीषण प्रकोप का सामना कर रहा है, लेकिन इस बार हालात पहले से कहीं अधिक गंभीर बताए जा रहे हैं। महज दो महीनों के भीतर एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों को भी चिंतित कर दिया है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस बार फैल रहा वायरस का नया बुन्डिबुग्यो वैरिएंट मौजूदा वैक्सीन और दवाओं के दायरे से बाहर है। ऐसे में संक्रमण तेजी से फैल रहा है, जबकि स्वास्थ्य व्यवस्था संसाधनों की कमी, हिंसा और स्थानीय विरोध जैसी कई चुनौतियों से जूझ रही है।
तेजी से बढ़ रहा मौत का आंकड़ा
अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Africa CDC) के मुताबिक कांगो में इबोला से अब तक 1,031 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। घाना में आयोजित एक स्वास्थ्य सम्मेलन के दौरान संस्था के महानिदेशक डॉ. जीन कासेया ने कहा कि हालात बेहद चिंताजनक हैं क्योंकि संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त वैक्सीन, दवाइयां और आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लोग बीमारी से कम और इलाज की कमी की वजह से अधिक जान गंवा रहे हैं।
नए वैरिएंट ने बढ़ाई मुश्किलें
कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 15 मई को घोषित बुन्डिबुग्यो वैरिएंट पहले के इबोला वायरस से अलग है। यही वजह है कि इसके खिलाफ अब तक कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष दवा उपलब्ध नहीं हो सकी है। सोमवार तक इस संक्रमण के 2,473 मामलों की पुष्टि की जा चुकी थी, जबकि 737 से अधिक मरीज अस्पतालों और आइसोलेशन केंद्रों में भर्ती थे। विशेषज्ञों का मानना है कि वैक्सीन की अनुपलब्धता इस प्रकोप को और अधिक खतरनाक बना रही है। स्वास्थ्यकर्मियों के पास संक्रमित मरीजों का उपचार करने के सीमित विकल्प हैं, जिससे मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है।
इतिहास के सबसे तेज इबोला प्रकोपों में शामिल हुआ संक्रमण
विशेषज्ञों का कहना है कि यह इबोला महामारी रिकॉर्ड में दर्ज सबसे तेजी से फैलने वाले प्रकोपों में से एक बन गई है। 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला प्रकोप को अब तक सबसे भयावह माना जाता था। उस दौरान करीब 28 हजार लोग संक्रमित हुए थे और 11 हजार से अधिक लोगों की जान गई थी। हालांकि उस महामारी में एक हजार मौतों का आंकड़ा पार करने में लगभग आठ महीने लगे थे, जबकि इस बार कांगो में महज दो महीने के भीतर ही मौतों की संख्या एक हजार के पार पहुंच गई है। यही कारण है कि वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियां इसे बेहद गंभीर मान रही हैं।
डब्ल्यूएचओ ने कहा, वास्तविक आंकड़े हो सकते हैं कई गुना ज्यादा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि आधिकारिक आंकड़े वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाते। संगठन के अनुसार संक्रमण और मौतों की वास्तविक संख्या सरकारी रिकॉर्ड से दो से चार गुना अधिक हो सकती है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कई प्रभावित इलाके विद्रोही गुटों के कब्जे या संघर्ष वाले क्षेत्रों में आते हैं, जहां स्वास्थ्य टीमें आसानी से नहीं पहुंच पातीं। ऐसे इलाकों में न तो सभी मरीजों की पहचान हो पाती है और न ही संक्रमण के सही आंकड़े जुटाए जा सकते हैं।
कैसे फैलता है इबोला वायरस?
इबोला एक दुर्लभ लेकिन बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है। यह संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी, शरीर के अन्य तरल पदार्थों या वीर्य के संपर्क में आने से फैलता है। संक्रमण होने के बाद मरीज में तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी, दस्त और गंभीर मामलों में आंतरिक व बाहरी रक्तस्राव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर समय पर इलाज और निगरानी न मिले तो यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है। यही वजह है कि संक्रमित मरीजों को तुरंत आइसोलेशन में रखना और उनके संपर्क में आए लोगों की निगरानी करना बेहद जरूरी माना जाता है।
संक्रमण अब नियंत्रण क्षेत्रों से भी बाहर पहुंच रहा है
स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि लगभग 80 प्रतिशत नए संक्रमित मरीज उन इलाकों से सामने आ रहे हैं, जिन्हें पहले संक्रमण का केंद्र नहीं माना गया था। इसका मतलब है कि वायरस अब स्वास्थ्य एजेंसियों की निगरानी से भी अधिक तेजी से नए क्षेत्रों में फैल रहा है। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग इतुरी प्रांत समेत पांच प्रभावित प्रांतों में निगरानी, जांच और इलाज की व्यवस्था मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन संक्रमण की रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है।
शवों के अंतिम संस्कार को लेकर बढ़ रही मुश्किलें
इबोला के दौरान मृतकों का सुरक्षित अंतिम संस्कार संक्रमण रोकने का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन कांगो में यही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कई समुदाय पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार शवों का अंतिम संस्कार करना चाहते हैं और सुरक्षित दफनाने वाली टीमों का विरोध कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमित शवों के सीधे संपर्क में आने से वायरस तेजी से फैल सकता है। इसके बावजूद कई इलाकों में स्वास्थ्य टीमों को काम करने नहीं दिया जा रहा, जिससे संक्रमण रोकने के प्रयास प्रभावित हो रहे हैं।
संसाधनों की कमी से बिगड़ रहे हालात
संक्रमित इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों और राहत टीमों पर हमले भी सामने आए हैं। सुरक्षा कारणों से कई सहायता संगठनों और फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों को कुछ क्षेत्रों से अपना काम रोकना पड़ा है। इसके अलावा कई स्वास्थ्यकर्मियों ने वेतन न मिलने की शिकायत करते हुए हड़ताल भी शुरू कर दी है।