नेपाल में बार-बार क्यों मच रही तबाही? पिघलते ग्लेशियरों का खौफनाक कनेक्शन समझिए
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में बढ़ते प्राकृतिक खतरे की ओर इशारा कर रही हैं। 11 अक्टूबर 2026 को गोरखा जिले में बुढ़ी गंडक नदी में आई बाढ़ से कई घरों, पुलों और बिजली से जुड़े ढांचों को नुकसान पहुंचा। शुरुआती रिपोर्टों में पांच लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई। इससे पहले अगस्त 2026 में भी इसी नदी तंत्र के आसपास अचानक बाढ़ आई थी। नेपाल में ऐसी आपदाओं के पीछे सिर्फ तेज बारिश ही नहीं, बल्कि पहाड़ों की भौगोलिक बनावट, ग्लेशियरों का पिघलना और नदियों के आसपास बसी आबादी जैसे कई कारण हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को और गंभीर बना सकता है, हालांकि हर बाढ़ की वजह एक जैसी नहीं होती।
हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियर क्यों तेजी से पिघल रहे हैं?
नेपाल का पहाड़ी क्षेत्र हिंदू कुश हिमालय का हिस्सा है, जहां बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों पर दबाव बढ़ रहा है। ग्लेशियर बर्फ के विशाल भंडार होते हैं, जो लंबे समय में धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते हैं। तापमान बढ़ने पर इनकी बर्फ पिघलती है और पानी नदियों तक पहुंचता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12 फीसदी की कमी आई, जबकि उनके बर्फ भंडार में लगभग 9 फीसदी गिरावट दर्ज की गई। ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव से नदी के प्रवाह और पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक जोखिमों पर असर पड़ सकता है।
ग्लेशियरों के पास बनी झीलें कैसे ला सकती हैं अचानक बाढ़?
ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से कई जगह पानी जमा होकर झीलों का रूप ले लेता है। इन झीलों का पानी अक्सर पत्थरों और ग्लेशियर से आए मलबे की प्राकृतिक दीवारों के पीछे रुका रहता है। यदि भूस्खलन से चट्टानें झील में गिरें या बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर पानी में समा जाए, तो तेज लहर पैदा हो सकती है। इससे झील की प्राकृतिक दीवार टूटने और पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर बहने का खतरा बढ़ जाता है। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। हालांकि, खतरे का स्तर झील के आकार, उसकी स्थिति और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हर बाढ़ के पीछे ग्लेशियर या ग्लेशियल झील की भूमिका होना जरूरी नहीं है।
नेपाल में भारी बारिश और भूस्खलन भी बड़ी चुनौती
नेपाल में जून से सितंबर के बीच मानसून सक्रिय रहता है। बारिश खेती और नदियों के लिए जरूरी है, लेकिन कम समय में अत्यधिक वर्षा होने पर नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन का खतरा पैदा हो सकता है। 27 से 29 सितंबर 2024 के बीच नेपाल में हुई भारी बारिश के दौरान कई इलाकों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई थीं। पहाड़ों से बहकर आने वाला पानी, मिट्टी और चट्टानें सड़कों, पुलों और बस्तियों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। नदियों के किनारे बसी आबादी और संवेदनशील इलाकों में मौजूद बुनियादी ढांचा ऐसी आपदाओं के असर को और गंभीर बना सकता है।
जलवायु परिवर्तन से कितना बढ़ रहा है खतरा?
ICIMOD के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय का औसत तापमान हर दशक करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। तापमान में वृद्धि से ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम बढ़ने की आशंका है। हालांकि, किसी खास बाढ़ या भूस्खलन को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी होती है। भारी बारिश, पहाड़ों की बनावट, नदी के रास्ते में मलबा जमा होना और स्थानीय परिस्थितियां भी आपदा की गंभीरता तय करती हैं। नेपाल जैसे पहाड़ी देश में समय रहते चेतावनी जारी करना, ग्लेशियल झीलों की निगरानी करना और संवेदनशील इलाकों में प्रभावी आपदा प्रबंधन अपनाना नुकसान कम करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।