ATACMS से लेकर THAAD तक… 5 महीने की जंग में खत्म हो गया अमेरिका का मिसाइल स्टॉक? जानें पूरी जानकारी
ईरान के साथ करीब पांच महीने तक चले लंबे सैन्य संघर्ष ने अमेरिका की ताकत के उस पहलू को उजागर कर दिया है, जिस पर अब रक्षा विशेषज्ञ गंभीर चर्चा कर रहे हैं। दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य क्षमता रखने वाले अमेरिका को इस युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में अपनी लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ा। लगातार चल रहे ऑपरेशनों के कारण अमेरिकी हथियार भंडार पर दबाव बढ़ा और अब सवाल उठ रहे हैं कि यदि भविष्य में चीन या रूस जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों के साथ संघर्ष की स्थिति बनती है तो क्या अमेरिका उतनी ही मजबूती से जवाब देने की स्थिति में होगा। यही वजह है कि इस युद्ध ने केवल सैन्य अभियान ही नहीं, बल्कि अमेरिका की रक्षा तैयारियों की वास्तविक क्षमता पर भी नई बहस छेड़ दी है।
ATACMS और PrSM मिसाइलों का बड़े पैमाने पर हुआ इस्तेमाल
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध की शुरुआत में अमेरिकी सेना को उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन हालात इसके उलट साबित हुए। लंबे समय तक चले सैन्य अभियान में सेना को लगातार ATACMS और नई पीढ़ी की Precision Strike Missile (PrSM) जैसी हाई-प्रिसिजन मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ा। ये दोनों जमीन से जमीन पर मार करने वाली आधुनिक मिसाइलें हैं, जिनका उद्देश्य सुरक्षित दूरी से दुश्मन के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को बेहद सटीक तरीके से निशाना बनाना होता है। PrSM को ATACMS का आधुनिक और अधिक सक्षम विकल्प माना जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड के पास मौजूद इन मिसाइलों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल हो गया, जिसके बाद दूसरे सैन्य ठिकानों से अतिरिक्त हथियार मंगाकर जरूरत पूरी करनी पड़ी।
व्हाइट हाउस ने कमी से किया इनकार
हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने हथियारों की कमी की आशंकाओं को खारिज किया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि अमेरिका के पास अब भी दुनिया के किसी भी देश से अधिक सैन्य संसाधन उपलब्ध हैं और रक्षा कंपनियां रिकॉर्ड स्तर पर मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाने में जुटी हुई हैं। पेंटागन ने भी भरोसा दिलाया है कि अमेरिकी सेना अपने राष्ट्रीय हितों और सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। फिर भी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हर ATACMS और PrSM मिसाइल की कीमत 10 लाख डॉलर से अधिक होने के कारण इनका उत्पादन तेजी से बढ़ाना आसान नहीं है। ऐसे में यदि भविष्य में किसी बड़े मोर्चे पर अचानक व्यापक युद्ध छिड़ता है तो हथियारों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
इन मिसाइलों के भंडार पर भी पड़ा असर
रक्षा मामलों पर काम करने वाली संस्था CSIS की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के साथ संघर्ष के दौरान अमेरिका ने बड़ी संख्या में पैट्रियट इंटरसेप्टर और THAAD इंटरसेप्टर मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया, जिससे इनके भंडार में उल्लेखनीय कमी आई है। इसके अलावा अमेरिकी नौसेना ने भी अपनी टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का बड़ा हिस्सा सैन्य अभियानों में खर्च किया। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध केवल अत्याधुनिक हथियारों के दम पर नहीं जीते जाते, बल्कि लगातार और पर्याप्त हथियार आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि अमेरिका अब अपने रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता बढ़ाने और मिसाइल निर्माण की रफ्तार तेज करने पर जोर दे रहा है, ताकि भविष्य में किसी बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान उसकी रणनीतिक बढ़त कमजोर न पड़े।