ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने किराना हिल्स पर किया था हमला? पूर्व CDS ने किया बड़ा खुलासा
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में आयोजित ‘विमर्श’ कार्यक्रम में पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर के रणनीतिक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इस सैन्य कार्रवाई को भारत की पिछली सैन्य कार्रवाइयों से अलग बताते हुए इसकी रणनीति और उद्देश्यों पर बात की। उन्होंने कैराना हिल्स को लेकर उठने वाले सवालों का भी जिक्र किया और बताया कि ऑपरेशन के दौरान भारत ने किस तरह अपने लिए तैयार किए गए एस्केलेशन मैट्रिक्स के तहत कदम उठाए।
ऑपरेशन सिंदूर का असर अब भी जारी
पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के मुख्य एक्टिव ऑपरेशन्स समाप्त हुए करीब एक साल और तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन कुछ मायनों में इसका प्रभाव आज भी जारी है। मुख्य सैन्य कार्रवाई भले ही पूरी हो चुकी हो, लेकिन भारत और विदेशों में रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच यह ऑपरेशन अब भी गहरी दिलचस्पी का विषय बना हुआ है। उन्होंने इसके दूरगामी रणनीतिक प्रभावों को समझने के लिए व्यापक नजरिए की जरूरत पर भी जोर दिया।
क्या भारत ने कैराना हिल्स पर किया था हमला?
कैराना हिल्स पर हमले से जुड़े सवालों पर जनरल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन से पहले भारत ने सरगोधा में कई लोइटरिंग मिशन भेजे थे। उन्होंने बताया कि किराना हिल्स सरगोधा से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर में है। इन लोइटरिंग मिशनों का उद्देश्य सरगोधा और उसके आसपास मौजूद राडार का पता लगाना था। उन्होंने बताया कि ऐसे मिशन एक तय समय-सीमा के लिए हवा में रहते हैं और अगर उन्हें कोई लक्ष्य नहीं मिलता तो वे नीचे आकर कहीं टकरा सकते हैं। ऐसे में संभव है कि इनमें से कोई मिशन उन्हीं पहाड़ियों में से किसी से टकराया हो।
पाकिस्तानी मीडिया की तस्वीरों का भी किया जिक्र
पूर्व CDS ने कहा कि लोगों के मन में कैराना हिल्स को लेकर सवाल उठने की एक वजह पाकिस्तानी मीडिया की ओर से दिखाई गई कुछ तस्वीरें भी हो सकती हैं। इन तस्वीरों में किराना हिल्स से धुआं निकलता हुआ दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों को देखते हुए इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में लोइटरिंग मिशन के संभावित टकराने की संभावना का ही उल्लेख किया।
पिछली सैन्य कार्रवाइयों से कैसे अलग था ऑपरेशन सिंदूर
जनरल अनिल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर पिछली सैन्य कार्रवाइयों से इस मायने में अलग था कि इसमें रणनीति को लेकर किसी तरह की अनिश्चितता या हिचकिचाहट नहीं दिखाई गई। उन्होंने बताया कि उरी हमले के बाद भारत ने जमीनी रास्ते से सर्जिकल स्ट्राइक की थी, जबकि पुलवामा हमले के बाद भारी सैन्य बल के साथ हवाई हमले का रुख अपनाया गया था। इसके विपरीत ऑपरेशन सिंदूर में निचले हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए एक अलग रणनीतिक रास्ता अपनाया गया, जिसका उद्देश्य सीधे संघर्ष के जोखिम को कम करना, ऑपरेशन की सफलता सुनिश्चित करना और दुश्मन को संभलने का मौका दिए बिना अचानक व सटीक प्रहार करना था।
बदलते युद्ध के स्वरूप के मुताबिक ढलना जरूरी
पूर्व CDS ने कहा कि किसी भी सैन्य ऑपरेशन का मूल्यांकन व्यापक नजरिए से किया जाना चाहिए। इसके तहत ऑपरेशन के दौरान सामने आई कमियों की पहचान करना, उन्हें दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाना और आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप के अनुसार खुद को लगातार ढालना जरूरी है। उन्होंने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भविष्य की सैन्य तैयारियों को मजबूत करना किसी भी देश की रक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राजनीति, जोखिम और सेना की दोहरी भूमिका
कार्ल वॉन क्लॉजविट्ज के रणनीतिक सिद्धांत का उल्लेख करते हुए जनरल चौहान ने कहा कि किसी भी देश के राजनीतिक हित सर्वोपरि होते हैं और सशस्त्र बल उन हितों की रक्षा के साधनों में से एक हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जब बल प्रयोग का फैसला करती है, तो सैन्य नेतृत्व की दोहरी जिम्मेदारी होती है। पहली, सरकार को रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विविध और प्रभावी सैन्य विकल्प उपलब्ध कराना और दूसरी, सरकार में यह भरोसा पैदा करना कि सशस्त्र बल इन विकल्पों को सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षमता शांति के समय की तैयारियों, कड़ी ट्रेनिंग, वॉरगेमिंग और आकस्मिक योजनाओं पर निर्भर करती है। उनके मुताबिक जोखिम और राजनीतिक लक्ष्यों के बीच सही संतुलन बनाना जरूरी है और ऑपरेशन सिंदूर से सामने आई चुनौतियां आधुनिक युद्ध प्रणाली के बदलते स्वरूप के बीच भारत की भविष्य की रक्षा रणनीति के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय करती हैं।