आज पेश होंगे चार विधेयक, परिसीमन बिल पर सियासी संग्राम, DMK के 22 सांसद बनेंगे गेमचेंजर?
संसद के मानसून सत्र के आखिरी चार दिन अब केंद्र सरकार और विपक्ष, दोनों के लिए बेहद अहम हो गए हैं। परिसीमन विधेयक को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज है और इस पूरे घटनाक्रम में तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दे रही है। लोकसभा में संख्या बल के मौजूदा समीकरणों के बीच डीएमके के 22 सांसद किसी भी पक्ष का गणित बदलने की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की नजरें अब डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के रुख पर टिकी हैं।
पिछली बार परिसीमन विधेयक को लेकर विपक्ष ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। लेकिन इसके बाद तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में हुई टूट ने लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों को काफी हद तक बदल दिया है। ऐसे में सरकार एक बार फिर इस विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी संख्या जुटाने की कोशिश में है। दूसरी ओर विपक्ष अपने खेमे को एकजुट रखने के साथ-साथ डीएमके और एनसीपी-एसपी जैसे दलों को अपने साथ बनाए रखने की कवायद में जुटा है।
परिसीमन पर डीएमके का रुख अभी साफ नहीं
परिसीमन विधेयक को लेकर डीएमके ने अभी तक अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। यही अनिश्चितता मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को और दिलचस्प बना रही है। सरकार की ओर से डीएमके को अपने पक्ष में लाने के प्रयास लगातार जारी हैं, जबकि विपक्ष भी एमके स्टालिन के साथ संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
केंद्र सरकार के लिए डीएमके इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि मौजूदा संख्या बल के आधार पर केवल अपने सहयोगियों के भरोसे संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को पारित कराना आसान नहीं होगा। दूसरी तरफ विपक्ष के पास भी पहले जैसी मजबूत संख्या नहीं बची है। ऐसे में डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन या विरोध पूरे गणित को प्रभावित कर सकता है।
सरकार ने अभी कार्यसूची में नहीं रखा परिसीमन बिल
दिलचस्प बात यह है कि सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा की कार्यसूची में परिसीमन विधेयक को शामिल नहीं किया गया है। इसे सरकार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि सत्ता पक्ष पहले जरूरी संख्या को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता है और इसके बाद ही विधेयक को सदन में लाने का फैसला करेगा।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू हालांकि परिसीमन के मुद्दे पर लगातार विपक्ष को घेर रहे हैं। महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए परिसीमन को जरूरी बताते हुए सरकार विपक्षी दलों पर समर्थन के लिए दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत विपक्ष के कई नेताओं से भी इस मुद्दे पर सरकार की ओर से राजनीतिक संवाद की कोशिशें जारी हैं।
लोकसभा में एनडीए का संख्या बल मजबूत हुआ
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में हुई राजनीतिक टूट के बाद एनडीए की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई है। लोकसभा में पहले एनडीए के पास करीब 293 सांसदों का संख्या बल बताया गया था। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों और शिवसेना (यूबीटी) से अलग होकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ आए छह सांसदों ने सत्ता पक्ष के आंकड़े को और बढ़ा दिया।
इसके अलावा वाईएसआर कांग्रेस के चार सांसद और कुछ निर्दलीय सांसद भी अलग-अलग मुद्दों पर सरकार का समर्थन कर चुके हैं। अकाली दल के एक सांसद ने भी परिसीमन के मुद्दे पर एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया है। इन सभी को मिलाकर सरकार के पक्ष में संभावित संख्या 326 से ऊपर पहुंचती दिखाई दे रही है।
वाईएसआर कांग्रेस इससे पहले अप्रैल में भी परिसीमन विधेयक पर सरकार के साथ खड़ी नजर आई थी। ऐसे में सत्ता पक्ष को उम्मीद है कि इस बार भी वह कुछ गैर-एनडीए दलों और निर्दलीय सांसदों के समर्थन से अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
तिहाई बहुमत के लिए अभी भी बड़ा फासला
परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के लिए सिर्फ साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होगा। इसे पारित कराने के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सांसदों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होगी। यही वजह है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जरूरी संख्या जुटाने की है।
पिछली बार सरकार को इस विधेयक पर करीब 298 सांसदों का समर्थन मिला था, लेकिन यह आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से काफी कम था। लोकसभा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए सरकार को इस बार लगभग 350 से 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में 326 के आसपास पहुंच चुका संभावित संख्या बल भी अभी पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यहीं से डीएमके के 22 सांसदों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यदि डीएमके सरकार के पक्ष में आती है तो सत्ता पक्ष की राह काफी आसान हो सकती है। इसके बाद कुछ और सांसदों का समर्थन जुटाना सरकार के लिए अपेक्षाकृत आसान होगा। वहीं अगर डीएमके विपक्ष के साथ खड़ी रहती है तो सरकार के लिए जरूरी दो-तिहाई आंकड़े तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।
विपक्ष के सामने भी आसान नहीं है राह
परिसीमन विधेयक पर सरकार को रोकने की विपक्ष की रणनीति भी इस बार पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही है। अप्रैल में विपक्षी गठबंधन ने करीब 230 सांसदों को एकजुट कर सरकार के खिलाफ मतदान कराया था। लेकिन उसके बाद तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में हुई टूट ने विपक्ष की संख्या को काफी कमजोर कर दिया है।
मौजूदा परिस्थितियों में इंडी गठबंधन के पास करीब 179 सांसद बताए जा रहे हैं। आम आदमी पार्टी के तीन सांसद, एआईएमआईएम, बीटीपी और आजाद समाज पार्टी के एक-एक सांसद तथा चार निर्दलीय सांसदों को जोड़ने पर विपक्षी खेमे की संभावित संख्या करीब 189 तक पहुंचती है। ये वे सांसद हैं जिन्होंने पिछली बार भी परिसीमन विधेयक का विरोध किया था।
ऐसे में विपक्ष के सामने सिर्फ सरकार को रोकने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने मौजूदा सहयोगियों को एकजुट रखने की भी बड़ी परीक्षा है। खासकर डीएमके का रुख विपक्षी रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है।
एनसीपी-एसपी को साथ रखना भी जरूरी
डीएमके के अलावा शरद पवार की एनसीपी-एसपी भी विपक्षी गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में टूट के बाद विपक्षी खेमे की राजनीतिक ताकत पहले ही प्रभावित हुई है। ऐसे में अगर कोई और प्रमुख दल अलग रुख अपनाता है तो परिसीमन के खिलाफ विपक्ष की चुनौती और कमजोर हो सकती है।
इसी कारण मानसून सत्र के अंतिम दिनों में विपक्षी दलों के बीच लगातार बातचीत और रणनीति पर मंथन चल रहा है। विपक्ष की कोशिश है कि किसी भी स्थिति में उसके खेमे में और सेंध न लगे और मतदान के समय सभी सांसद एकजुट रहें।
स्टालिन के फैसले पर दोनों खेमों की नजर
डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में बदलाव के बाद तमिलनाडु की राजनीति एमके स्टालिन के लिए प्राथमिकता बन गई है। यही स्थिति केंद्र सरकार के लिए उम्मीद का आधार भी बन रही है। सत्ता पक्ष को लगता है कि राष्ट्रीय राजनीति में अपने विकल्प खुले रखते हुए डीएमके तमिलनाडु के राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर परिसीमन पर अपना रुख तय कर सकती है।
दूसरी ओर विपक्षी दलों की कोशिश है कि स्टालिन को यह भरोसा दिलाया जाए कि परिसीमन के मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़े रहना दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक हितों के लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे में आने वाले दिनों में डीएमके के साथ दोनों पक्षों की बातचीत और भी तेज होने की संभावना है।
सोमवार को कई अहम विधेयक होंगे पेश
संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिनों में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सोमवार को लोकसभा में न्यायाधिकरण सुधार विधेयक-2026, खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक-2026, केरल (नाम में बदलाव) विधेयक-2026 और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक-2026 जैसे प्रस्ताव सदन में पेश किए जाने हैं।
राज्यसभा में बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल-2026 पर चर्चा प्रस्तावित है, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पेश करेंगी। इसके अलावा उच्च सदन में कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक-2026 पर भी विचार होना है।