छात्रों पर लाठीचार्ज को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा – शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार
देशभर में पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के बढ़ते विरोध-प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में रहकर किया गया विरोध हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज या अत्यधिक बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब विभिन्न राज्यों से पुलिस कार्रवाई को लेकर कई याचिकाएं शीर्ष अदालत के सामने पहुंची हैं।
पुलिस कार्रवाई पर स्वतंत्र जांच की जरूरत
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष पेश याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस की कथित ज्यादतियों के आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के लिए पूरे देश में एक समान पुलिस प्रोटोकॉल तैयार करना समय की जरूरत है, ताकि कानून व्यवस्था भी बनी रहे और नागरिकों के अधिकारों का भी सम्मान हो।
ज्यादती नहीं की जा सकती’
सीजेआई ने कहा कि संविधान के तहत शांतिपूर्ण, कानूनी विरोध का अधिकार पूरी तरह से सुरक्षित है. जब तक यह शांतिपूर्ण विरोध है, सिर्फ इसलिए कि विरोध हो रहा है, ज्यादती नहीं की जा सकती और अगर ज्यादती हुई है, तो इसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए. ये सिर्फ दिल्ली का मामला नहीं है. प्रोटोकॉल में एकरूपता जरूरी है. सिर्फ विरोध होने का मतलब लाठीचार्ज नहीं है. अनुशासन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. कोर्ट ने घटना के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से पेश वकील के कार्यवाही में शामिल होने के अनुरोध को भी मंजूरी दे दी.
दिल्ली के संसद मार्च का भी हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान 20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में हुए ‘संसद चलो’ प्रदर्शन का भी उल्लेख किया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई थी। सोशल मीडिया पर सामने आए कई वीडियो और तस्वीरों में पुलिस को संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दागते हुए देखा गया था। इन घटनाओं के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठे और मामला अदालत तक पहुंचा।