Global Growth में भारत की धाक! चीन-यूरोप से निकला आगे, 74% इकोनॉमिस्ट्स ने जताया भरोसा
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की विकास रफ्तार को लेकर ग्लोबल इकोनॉमिस्ट्स का भरोसा बढ़ता नजर आ रहा है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के सितंबर के Chief Economists’ Outlook में भारत को अगले 12 महीनों के लिए सबसे मजबूत ग्रोथ आउटलुक वाले क्षेत्रों में रखा गया है। सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को भारत में औसत या उससे बेहतर ग्रोथ की उम्मीद है, जबकि 74 फीसदी ने मजबूत या बहुत मजबूत वृद्धि का अनुमान जताया है।
भारत की ग्रोथ उम्मीदों में आया बड़ा बदलाव
भारत को लेकर अर्थशास्त्रियों का नजरिया मई के मुकाबले काफी बदला है। मई में 52 फीसदी अर्थशास्त्री अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ की उम्मीद कर रहे थे, जबकि सितंबर के आकलन में यह आंकड़ा बढ़कर 74 फीसदी हो गया। WEF के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग भारत के ग्रोथ आउटलुक को लगातार सहारा दे रही है।
GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 फीसदी
WEF ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 फीसदी किया है। हालांकि, रिपोर्ट में ऊंची ऊर्जा कीमतों को भारत की आर्थिक संभावनाओं के लिए एक प्रमुख जोखिम बताया गया है। जियोपॉलिटिकल तनाव के साथ ऊर्जा बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
चीन की तस्वीर भारत से अलग
भारत की बेहतर होती ग्रोथ उम्मीदों के उलट चीन को लेकर अर्थशास्त्रियों का नजरिया कमजोर हुआ है। WEF के आकलन में करीब एक-तिहाई अर्थशास्त्रियों को चीन में कमजोर ग्रोथ की आशंका है। इस तरह भारत और चीन के लिए अगले 12 महीनों का आर्थिक आउटलुक अलग-अलग दिशा में जाता दिखाई दे रहा है।
यूरोप के सामने अब भी चुनौती
यूरोप की स्थिति में पिछले आकलन की तुलना में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन ग्रोथ आउटलुक के मामले में यह अभी भी सबसे कमजोर क्षेत्र बना हुआ है। सर्वे में 61 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने यूरोप में कमजोर या बहुत कमजोर ग्रोथ की आशंका जताई है। यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों के बावजूद यूरोप की रफ्तार को लेकर चिंता बनी हुई है।
अमेरिका और एशिया से भी उम्मीद
अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के लिए भी मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई गई है। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक ग्रोथ की तस्वीर अलग-अलग क्षेत्रों में काफी अलग है। इस बीच भारत को घरेलू मांग के मजबूत सहारे के कारण सबसे सकारात्मक ग्रोथ आउटलुक वाले क्षेत्रों में प्रमुख स्थान मिला है।
ग्लोबल इकोनॉमी को लेकर भी बदला मूड
वैश्विक स्तर पर भी अर्थशास्त्रियों का नजरिया मई के मुकाबले बेहतर हुआ है। सितंबर के सर्वे में 56 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में ग्लोबल इकोनॉमिक स्थिति स्थिर रहेगी या उसमें सुधार होगा। मई में ऐसा मानने वाले अर्थशास्त्रियों का हिस्सा सिर्फ 11 फीसदी था, जबकि 89 फीसदी ने उस समय हालात बिगड़ने की आशंका जताई थी।
जियोपॉलिटिक्स और महंगी ऊर्जा बनी चुनौती
सुधार के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम कम नहीं हुए हैं। सर्वे में 97 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने जियोपॉलिटिकल टकरावों को अगले साल अनिश्चितता का संभावित कारण बताया है। वहीं 58 फीसदी अर्थशास्त्रियों को एसेट प्राइस में करेक्शन की उम्मीद है। भारत के लिए खास चुनौती ऊर्जा की ऊंची कीमतें हैं, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित कच्चे तेल पर काफी निर्भर है।
घरेलू मांग से मजबूत हुई भारत की तस्वीर
भारत के लिए सबसे अहम सहारा मजबूत घरेलू मांग को माना जा रहा है। WEF के आकलन के मुताबिक, आंतरिक मांग बाहरी जोखिमों के बावजूद आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकती है। हालांकि, भारत की मजबूत विकास क्षमता और मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कारोबारी आकर्षण को लेकर तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। मई में अनुकूल कारोबारी माहौल के मामले में भारत की रैंकिंग दूसरे से गिरकर चौथे स्थान पर आई और भारत को अपनी शीर्ष तीन कारोबारी जगहों में शामिल करने वाले अर्थशास्त्रियों का हिस्सा 56 फीसदी से घटकर 40 फीसदी रह गया।